ग्रंथऋग्वेदमण्डल 10सूक्त 105105.2ऋग्वेद 105.2हरी॒ यस्य॑ सु॒युजा॒ विव्र॑ता॒ वेरर्व॒न्तानु॒ शेपा॑ । उ॒भा र॒जी न के॒शिना॒ पति॒र्दन् ॥२॥पिछलाअगलापूरा अध्याय