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ऋग्वेद 48.6

वि या सृ॒जति॒ सम॑नं॒ व्य१र्थिन॑ः प॒दं न वे॒त्योद॑ती ।
वयो॒ नकि॑ष्टे पप्ति॒वांस॑ आसते॒ व्यु॑ष्टौ वाजिनीवति ॥६॥

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