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ऋग्वेद 47.7

यन्ना॑सत्या परा॒वति॒ यद्वा॒ स्थो अधि॑ तु॒र्वशे॑ ।
अतो॒ रथे॑न सु॒वृता॑ न॒ आ ग॑तं सा॒कं सूर्य॑स्य र॒श्मिभि॑ः ॥७॥

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