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ऋग्वेद 45.7

नि त्वा॒ होता॑रमृ॒त्विजं॑ दधि॒रे व॑सु॒वित्त॑मम् । श्रुत्क॑र्णं स॒प्रथ॑स्तमं॒ विप्रा॑ अग्ने॒ दिवि॑ष्टिषु ॥७॥

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