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ऋग्वेद 186.5

उ॒त नो ऽहि॑र्बु॒ध्न्यो॒३ मय॑स्क॒ः शिशुं॒ न पि॒प्युषी॑व वेति॒ सिन्धु॑ः ।
येन॒ नपा॑तम॒पां जु॒नाम॑ मनो॒जुवो॒ वृष॑णो॒ यं वह॑न्ति ॥५॥

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