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ऋग्वेद 161.11

उ॒द्वत्स्व॑स्मा अकृणोतना॒ तृणं॑ नि॒वत्स्व॒पः स्व॑प॒स्यया॑ नरः ।
अगो॑ह्यस्य॒ यदस॑स्तना गृ॒हे तद॒द्येदमृ॑भवो॒ नानु॑ गच्छथ ॥११॥

पूरा अध्याय