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ऋग्वेद 153.3

पी॒पाय॑ धे॒नुरदि॑तिर्ऋ॒ताय॒ जना॑य मित्रावरुणा हवि॒र्दे ।
हि॒नोति॒ यद् वां॑ वि॒दथे॑ सप॒र्यन् त्स रा॒तह॑व्यो॒ मानु॑षो॒ न होता॑ ॥३॥

पूरा अध्याय