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ऋग्वेद 118.2

त्रि॒व॒न्धु॒रेण॑ त्रि॒वृता॒ रथे॑न त्रिच॒क्रेण॑ सु॒वृता या॑तम॒र्वाक् ।
पिन्व॑तं॒ गा जिन्व॑त॒मर्व॑तो नो व॒र्धय॑तमश्विना वी॒रम॒स्मे ॥२॥

पूरा अध्याय