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ऋग्वेद 102.5

नाना॒ हि त्वा॒ हव॑माना॒ जना॑ इ॒मे धना॑नां धर्त॒रव॑सा विप॒न्यव॑ः ।
अ॒स्माकं॑ स्मा॒ रथ॒मा ति॑ष्ठ सा॒तये॒ जैत्रं॒ ही॑न्द्र॒ निभृ॑तं॒ मन॒स्तव॑ ॥५॥

पूरा अध्याय