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ऋग्वेद 102.2

अ॒स्य श्रवो॑ न॒द्य॑ः स॒प्त बि॑भ्रति॒ द्यावा॒क्षामा॑ पृथि॒वी द॑र्श॒तं वपु॑ः ।
अ॒स्मे सू॑र्याचन्द्र॒मसा॑भि॒चक्षे॑ श्र॒द्धे कमि॑न्द्र चरतो वितर्तु॒रम् ॥२॥

पूरा अध्याय