ग्रंथश्रीरामचरितमानसउत्तरकाण्डदोहा 8888.2श्रीरामचरितमानस 88.2पुरूष नपुंसक नारि वा जीव चराचर कोइ। सर्ब भाव भज कपट तजि मोहि परम प्रिय सोइ ॥87(क)॥पिछलाअगलापूरा अध्याय