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श्रीरामचरितमानस 84.3

काकभसुंडि मागु बर अति प्रसन्न मोहि जानि।
अनिमादिक सिधि अपर रिधि मोच्छ सकल सुख खानि ॥83(ख)॥

पूरा अध्याय