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श्रीरामचरितमानस 82.2

भिन्न भिन्न मै दीख सबु अति बिचित्र हरिजान।
अगनित भुवन फिरेउँ प्रभु राम न देखेउँ आन ॥81(क)॥

पूरा अध्याय