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श्रीरामचरितमानस 80.2

ब्रह्मलोक लगि गयउँ मैं चितयउँ पाछ उड़ात।
जुग अंगुल कर बीच सब राम भुजहि मोहि तात ॥79(क)॥

पूरा अध्याय