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श्रीरामचरितमानस 6.4

पुनि प्रभु हरषि सत्रुहन भेंटे हृदयँ लगाइ।
लछिमन भरत मिले तब परम प्रेम दोउ भाइ ॥5॥

पूरा अध्याय