ग्रंथश्रीरामचरितमानसउत्तरकाण्डदोहा 4343.2श्रीरामचरितमानस 43.2जीवनमुक्त ब्रह्मपर चरित सुनहिं तजि ध्यान। जे हरि कथाँ न करहिं रति तिन्ह के हिय पाषान ॥42॥पिछलापूरा अध्याय