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श्रीरामचरितमानस 118.2

जोग अगिनि करि प्रगट तब कर्म सुभासुभ लाइ।
बुद्धि सिरावैं ग्यान घृत ममता मल जरि जाइ ॥117(क)॥

पूरा अध्याय