ग्रंथश्रीरामचरितमानसउत्तरकाण्डदोहा 116116.3श्रीरामचरितमानस 116.3सोउ मुनि ग्याननिधान मृगनयनी बिधु मुख निरखि। बिबस होइ हरिजान नारि बिष्नु माया प्रगट ॥115(ख)॥पिछलापूरा अध्याय