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श्रीरामचरितमानस 112.3

क्रोध कि द्वेतबुद्धि बिनु द्वैत कि बिनु अग्यान।
मायाबस परिछिन्न जड़ जीव कि ईस समान ॥111(ख)॥

पूरा अध्याय