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श्रीरामचरितमानस 104.2

कलिजुग सम जुग आन नहिं जौं नर कर बिस्वास।
गाइ राम गुन गन बिमलँ भव तर बिनहिं प्रयास ॥103(क)॥

पूरा अध्याय