श्रीरामचरितमानस 97.1
अंतरधान भयउ छन एका। पुनि प्रगटे खल रूप अनेका।।
रघुपति कटक भालु कपि जेते। जहँ तहँ प्रगट दसानन तेते।।
देखे कपिन्ह अमित दससीसा। जहँ तहँ भजे भालु अरु कीसा।।
भागे बानर धरहिं न धीरा। त्राहि त्राहि लछिमन रघुबीरा।।
दहँ दिसि धावहिं कोटिन्ह रावन। गर्जहिं घोर कठोर भयावन।।
डरे सकल सुर चले पराई। जय कै आस तजहु अब भाई।।
सब सुर जिते एक दसकंधर। अब बहु भए तकहु गिरि कंदर।।
रहे बिरंचि संभु मुनि ग्यानी। जिन्ह जिन्ह प्रभु महिमा कछु जानी।।