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श्रीरामचरितमानस 94.3

पुनि दसकंठ क्रुद्ध होइ छाँड़ी सक्ति प्रचंड।
चली बिभीषन सन्मुख मनहुँ काल कर दंड ॥93॥

पूरा अध्याय