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श्रीरामचरितमानस 75.2

खगपति सब धरि खाए माया नाग बरूथ।
माया बिगत भए सब हरषे बानर जूथ। 74(क)।।
गहि गिरि पादप उपल नख धाए कीस रिसाइ।
चले तमीचर बिकलतर गढ़ पर चढ़े पराइ ॥74(ख)॥

पूरा अध्याय