ग्रंथश्रीरामचरितमानसलङ्काकाण्डदोहा 6565.2श्रीरामचरितमानस 65.2बचन कर्म मन कपट तजि भजेहु राम रनधीर। जाहु न निज पर सूझ मोहि भयउँ कालबस बीर। 64।।पिछलापूरा अध्याय