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दोहा 59

59.1

चौपाई

कपि तव दरस भइउँ निष्पापा। मिटा तात मुनिबर कर सापा।।
मुनि न होइ यह निसिचर घोरा। मानहु सत्य बचन कपि मोरा।।
अस कहि गई अपछरा जबहीं। निसिचर निकट गयउ कपि तबहीं।।
कह कपि मुनि गुरदछिना लेहू। पाछें हमहि मंत्र तुम्ह देहू।।
सिर लंगूर लपेटि पछारा। निज तनु प्रगटेसि मरती बारा।।
राम राम कहि छाड़ेसि प्राना। सुनि मन हरषि चलेउ हनुमाना।।
देखा सैल न औषध चीन्हा। सहसा कपि उपारि गिरि लीन्हा।।
गहि गिरि निसि नभ धावत भयऊ। अवधपुरी उपर कपि गयऊ।।

59.2

दोहा/सोरठा

देखा भरत बिसाल अति निसिचर मन अनुमानि।
बिनु फर सायक मारेउ चाप श्रवन लगि तानि ॥58॥

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