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दोहा 45

45.1

चौपाई

जुद्ध बिरुद्ध क्रुद्ध द्वौ बंदर। राम प्रताप सुमिरि उर अंतर।।
रावन भवन चढ़े द्वौ धाई। करहि कोसलाधीस दोहाई।।
कलस सहित गहि भवनु ढहावा। देखि निसाचरपति भय पावा।।
नारि बृंद कर पीटहिं छाती। अब दुइ कपि आए उतपाती।।
कपिलीला करि तिन्हहि डेरावहिं। रामचंद्र कर सुजसु सुनावहिं।।
पुनि कर गहि कंचन के खंभा। कहेन्हि करिअ उतपात अरंभा।।
गर्जि परे रिपु कटक मझारी। लागे मर्दै भुज बल भारी।।
काहुहि लात चपेटन्हि केहू। भजहु न रामहि सो फल लेहू।।

45.2

दोहा/सोरठा

एक एक सों मर्दहिं तोरि चलावहिं मुंड।
रावन आगें परहिं ते जनु फूटहिं दधि कुंड ॥44॥

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