श्रीरामचरितमानस 36.1
कपि बल देखि सकल हियँ हारे। उठा आपु कपि कें परचारे।।
गहत चरन कह बालिकुमारा। मम पद गहें न तोर उबारा।।
गहसि न राम चरन सठ जाई। सुनत फिरा मन अति सकुचाई।।
भयउ तेजहत श्री सब गई। मध्य दिवस जिमि ससि सोहई।।
सिंघासन बैठेउ सिर नाई। मानहुँ संपति सकल गँवाई।।
जगदातमा प्रानपति रामा। तासु बिमुख किमि लह बिश्रामा।।
उमा राम की भृकुटि बिलासा। होइ बिस्व पुनि पावइ नासा।।
तृन ते कुलिस कुलिस तृन करई। तासु दूत पन कहु किमि टरई।।
पुनि कपि कही नीति बिधि नाना। मान न ताहि कालु निअराना।।
रिपु मद मथि प्रभु सुजसु सुनायो। यह कहि चल्यो बालि नृप जायो।।
हतौं न खेत खेलाइ खेलाई। तोहि अबहिं का करौं बड़ाई।।
प्रथमहिं तासु तनय कपि मारा। सो सुनि रावन भयउ दुखारा।।
जातुधान अंगद पन देखी। भय ब्याकुल सब भए बिसेषी।।