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श्रीरामचरितमानस 13.2

कह हनुमंत सुनहु प्रभु ससि तुम्हारा प्रिय दास।
तव मूरति बिधु उर बसति सोइ स्यामता अभास ॥12(क)॥

पूरा अध्याय