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श्रीरामचरितमानस 116.4

स्याम गात राजीव बिलोचन। दीन बंधु प्रनतारति मोचन।।
अनुज जानकी सहित निरंतर। बसहु राम नृप मम उर अंतर ॥4॥

पूरा अध्याय