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दोहा 103

103.1

चौपाई

काटत बढ़हिं सीस समुदाई। जिमि प्रति लाभ लोभ अधिकाई।।
मरइ न रिपु श्रम भयउ बिसेषा। राम बिभीषन तन तब देखा।।
उमा काल मर जाकीं ईछा। सो प्रभु जन कर प्रीति परीछा।।
सुनु सरबग्य चराचर नायक। प्रनतपाल सुर मुनि सुखदायक।।
नाभिकुंड पियूष बस याकें। नाथ जिअत रावनु बल ताकें।।
सुनत बिभीषन बचन कृपाला। हरषि गहे कर बान कराला।।
असुभ होन लागे तब नाना। रोवहिं खर सृकाल बहु स्वाना।।
बोलहि खग जग आरति हेतू। प्रगट भए नभ जहँ तहँ केतू।।
दस दिसि दाह होन अति लागा। भयउ परब बिनु रबि उपरागा।।
मंदोदरि उर कंपति भारी। प्रतिमा स्त्रवहिं नयन मग बारी।।

103.2

छंद

प्रतिमा रुदहिं पबिपात नभ अति बात बह डोलति मही।
बरषहिं बलाहक रुधिर कच रज असुभ अति सक को कही।।
उतपात अमित बिलोकि नभ सुर बिकल बोलहि जय जए।
सुर सभय जानि कृपाल रघुपति चाप सर जोरत भए।।

103.3

दोहा/सोरठा

खैचि सरासन श्रवन लगि छाड़े सर एकतीस।
रघुनायक सायक चले मानहुँ काल फनीस ॥102॥

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