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श्रीरामचरितमानस 8.2

कह बालि सुनु भीरु प्रिय समदरसी रघुनाथ।
जौं कदाचि मोहि मारहिं तौ पुनि होउँ सनाथ ॥7॥

पूरा अध्याय