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श्रीरामचरितमानस 29.2

मैं देखउँ तुम्ह नाहि गीघहि दष्टि अपार।।
बूढ भयउँ न त करतेउँ कछुक सहाय तुम्हार ॥28॥

पूरा अध्याय