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श्रीरामचरितमानस 6.2

सहज अपावनि नारि पति सेवत सुभ गति लहइ।
जसु गावत श्रुति चारि अजहु तुलसिका हरिहि प्रिय ॥5(क)॥

पूरा अध्याय