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दोहा 4

4.1

चौपाई

कहइ भुआलु सुनिअ मुनिनायक। भए राम सब बिधि सब लायक।।
सेवक सचिव सकल पुरबासी। जे हमारे अरि मित्र उदासी।।
सबहि रामु प्रिय जेहि बिधि मोही। प्रभु असीस जनु तनु धरि सोही।।
बिप्र सहित परिवार गोसाईं। करहिं छोहु सब रौरिहि नाई।।
जे गुर चरन रेनु सिर धरहीं। ते जनु सकल बिभव बस करहीं।।
मोहि सम यहु अनुभयउ न दूजें। सबु पायउँ रज पावनि पूजें।।
अब अभिलाषु एकु मन मोरें। पूजहि नाथ अनुग्रह तोरें।।
मुनि प्रसन्न लखि सहज सनेहू। कहेउ नरेस रजायसु देहू।।

4.2

दोहा/सोरठा

राजन राउर नामु जसु सब अभिमत दातार।
फल अनुगामी महिप मनि मन अभिलाषु तुम्हार ॥3॥

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