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दोहा 320

320.1

चौपाई

सानुज राम नृपहि सिर नाई। कीन्हि बहुत बिधि बिनय बड़ाई।।
देव दया बस बड़ दुखु पायउ। सहित समाज काननहिं आयउ।।
पुर पगु धारिअ देइ असीसा। कीन्ह धीर धरि गवनु महीसा।।
मुनि महिदेव साधु सनमाने। बिदा किए हरि हर सम जाने।।
सासु समीप गए दोउ भाई। फिरे बंदि पग आसिष पाई।।
कौसिक बामदेव जाबाली। पुरजन परिजन सचिव सुचाली।।
जथा जोगु करि बिनय प्रनामा। बिदा किए सब सानुज रामा।।
नारि पुरुष लघु मध्य बड़ेरे। सब सनमानि कृपानिधि फेरे।।

320.2

दोहा/सोरठा

भरत मातु पद बंदि प्रभु सुचि सनेहँ मिलि भेंटि।
बिदा कीन्ह सजि पालकी सकुच सोच सब मेटि ॥319॥

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