दोहा 314
314.1
चौपाई
भोर न्हाइ सबु जुरा समाजू। भरत भूमिसुर तेरहुति राजू।।
भल दिन आजु जानि मन माहीं। रामु कृपाल कहत सकुचाहीं।।
गुर नृप भरत सभा अवलोकी। सकुचि राम फिरि अवनि बिलोकी।।
सील सराहि सभा सब सोची। कहुँ न राम सम स्वामि सँकोची।।
भरत सुजान राम रुख देखी। उठि सप्रेम धरि धीर बिसेषी।।
करि दंडवत कहत कर जोरी। राखीं नाथ सकल रुचि मोरी।।
मोहि लगि सहेउ सबहिं संतापू। बहुत भाँति दुखु पावा आपू।।
अब गोसाइँ मोहि देउ रजाई। सेवौं अवध अवधि भरि जाई।।
314.2
दोहा/सोरठा
जेहिं उपाय पुनि पाय जनु देखै दीनदयाल।
सो सिख देइअ अवधि लगि कोसलपाल कृपाल ॥313॥