दोहा 299
299.1
चौपाई
प्रभु पितु मातु सुह्रद गुर स्वामी। पूज्य परम हित अतंरजामी।।
सरल सुसाहिबु सील निधानू। प्रनतपाल सर्बग्य सुजानू।।
समरथ सरनागत हितकारी। गुनगाहकु अवगुन अघ हारी।।
स्वामि गोसाँइहि सरिस गोसाई। मोहि समान मैं साइँ दोहाई।।
प्रभु पितु बचन मोह बस पेली। आयउँ इहाँ समाजु सकेली।।
जग भल पोच ऊँच अरु नीचू। अमिअ अमरपद माहुरु मीचू।।
राम रजाइ मेट मन माहीं। देखा सुना कतहुँ कोउ नाहीं।।
सो मैं सब बिधि कीन्हि ढिठाई। प्रभु मानी सनेह सेवकाई।।
299.2
दोहा/सोरठा
कृपाँ भलाई आपनी नाथ कीन्ह भल मोर।
दूषन भे भूषन सरिस सुजसु चारु चहु ओर ॥298॥