श्रीरामचरितमानस 274.1
गरइ गलानि कुटिल कैकेई। काहि कहै केहि दूषनु देई।।
अस मन आनि मुदित नर नारी। भयउ बहोरि रहब दिन चारी।।
एहि प्रकार गत बासर सोऊ। प्रात नहान लाग सबु कोऊ।।
करि मज्जनु पूजहिं नर नारी। गनप गौरि तिपुरारि तमारी।।
रमा रमन पद बंदि बहोरी। बिनवहिं अंजुलि अंचल जोरी।।
राजा रामु जानकी रानी। आनँद अवधि अवध रजधानी।।
सुबस बसउ फिरि सहित समाजा। भरतहि रामु करहुँ जुबराजा।।
एहि सुख सुधाँ सींची सब काहू। देव देहु जग जीवन लाहू।।