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दोहा 245

245.1

चौपाई

आरत लोग राम सबु जाना। करुनाकर सुजान भगवाना।।
जो जेहि भायँ रहा अभिलाषी। तेहि तेहि कै तसि तसि रुख राखी।।
सानुज मिलि पल महु सब काहू। कीन्ह दूरि दुखु दारुन दाहू।।
यह बड़ि बातँ राम कै नाहीं। जिमि घट कोटि एक रबि छाहीं।।
मिलि केवटिहि उमगि अनुरागा। पुरजन सकल सराहहिं भागा।।
देखीं राम दुखित महतारीं। जनु सुबेलि अवलीं हिम मारीं।।
प्रथम राम भेंटी कैकेई। सरल सुभायँ भगति मति भेई।।
पग परि कीन्ह प्रबोधु बहोरी। काल करम बिधि सिर धरि खोरी।।

245.2

दोहा/सोरठा

भेटीं रघुबर मातु सब करि प्रबोधु परितोषु।।
अंब ईस आधीन जगु काहु न देइअ दोषु ॥244॥

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