श्रीरामचरितमानस 156.1
धरि धीरजु उठी बैठ भुआलू। कहु सुमंत्र कहँ राम कृपालू।।
कहाँ लखनु कहँ रामु सनेही। कहँ प्रिय पुत्रबधू बैदेही।।
बिलपत राउ बिकल बहु भाँती। भइ जुग सरिस सिराति न राती।।
तापस अंध साप सुधि आई। कौसल्यहि सब कथा सुनाई।।
भयउ बिकल बरनत इतिहासा। राम रहित धिग जीवन आसा।।
सो तनु राखि करब मैं काहा। जेंहि न प्रेम पनु मोर निबाहा।।
हा रघुनंदन प्रान पिरीते। तुम्ह बिनु जिअत बहुत दिन बीते।।
हा जानकी लखन हा रघुबर। हा पितु हित चित चातक जलधर।