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दोहा 148

148.1

चौपाई

एहि बिधि करत पंथ पछितावा। तमसा तीर तुरत रथु आवा।।
बिदा किए करि बिनय निषादा। फिरे पायँ परि बिकल बिषादा।।
पैठत नगर सचिव सकुचाई। जनु मारेसि गुर बाँभन गाई।।
बैठि बिटप तर दिवसु गवाँवा। साँझ समय तब अवसरु पावा।।
अवध प्रबेसु कीन्ह अँधिआरें। पैठ भवन रथु राखि दुआरें।।
जिन्ह जिन्ह समाचार सुनि पाए। भूप द्वार रथु देखन आए।।
रथु पहिचानि बिकल लखि घोरे। गरहिं गात जिमि आतप ओरे।।
नगर नारि नर ब्याकुल कैंसें। निघटत नीर मीनगन जैंसें।।

148.2

दोहा/सोरठा

-सचिव आगमनु सुनत सबु बिकल भयउ रनिवासु।
भवन भयंकरु लाग तेहि मानहुँ प्रेत निवासु ॥147॥

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