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दोहा 104

104.1

चौपाई

तब मज्जनु करि रघुकुलनाथा। पूजि पारथिव नायउ माथा।।
सियँ सुरसरिहि कहेउ कर जोरी। मातु मनोरथ पुरउबि मोरी।।
पति देवर संग कुसल बहोरी। आइ करौं जेहिं पूजा तोरी।।
सुनि सिय बिनय प्रेम रस सानी। भइ तब बिमल बारि बर बानी।।
सुनु रघुबीर प्रिया बैदेही। तव प्रभाउ जग बिदित न केही।।
लोकप होहिं बिलोकत तोरें। तोहि सेवहिं सब सिधि कर जोरें।।
तुम्ह जो हमहि बड़ि बिनय सुनाई। कृपा कीन्हि मोहि दीन्हि बड़ाई।।
तदपि देबि मैं देबि असीसा। सफल होपन हित निज बागीसा।।

104.2

दोहा/सोरठा

प्राननाथ देवर सहित कुसल कोसला आइ।
पूजहि सब मनकामना सुजसु रहिहि जग छाइ ॥103॥

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