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श्रीरामचरितमानस 95.3

जगदंबा जहँ अवतरी सो पुरु बरनि कि जाइ।
रिद्धि सिद्धि संपत्ति सुख नित नूतन अधिकाइ ॥94॥

पूरा अध्याय