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श्रीरामचरितमानस 84.2

सुरन्ह कहीं निज बिपति सब सुनि मन कीन्ह बिचार।
संभु बिरोध न कुसल मोहि बिहसि कहेउ अस मार ॥83॥

पूरा अध्याय