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श्रीरामचरितमानस 75.2

भयउ मनोरथ सुफल तव सुनु गिरिजाकुमारि।
परिहरु दुसह कलेस सब अब मिलिहहिं त्रिपुरारि ॥74॥

पूरा अध्याय