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श्रीरामचरितमानस 348.2

होहिं सगुन बरषहिं सुमन सुर दुंदुभीं बजाइ।
बिबुध बधू नाचहिं मुदित मंजुल मंगल गाइ ॥347॥

पूरा अध्याय