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दोहा 331

331.1

चौपाई

नित नूतन मंगल पुर माहीं। निमिष सरिस दिन जामिनि जाहीं।।
बड़े भोर भूपतिमनि जागे। जाचक गुन गन गावन लागे।।
देखि कुअँर बर बधुन्ह समेता। किमि कहि जात मोदु मन जेता।।
प्रातक्रिया करि गे गुरु पाहीं। महाप्रमोदु प्रेमु मन माहीं।।
करि प्रनाम पूजा कर जोरी। बोले गिरा अमिअँ जनु बोरी।।
तुम्हरी कृपाँ सुनहु मुनिराजा। भयउँ आजु मैं पूरनकाजा।।
अब सब बिप्र बोलाइ गोसाईं। देहु धेनु सब भाँति बनाई।।
सुनि गुर करि महिपाल बड़ाई। पुनि पठए मुनि बृंद बोलाई।।

331.2

दोहा/सोरठा

बामदेउ अरु देवरिषि बालमीकि जाबालि।
आए मुनिबर निकर तब कौसिकादि तपसालि ॥330॥

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