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दोहा 281

281.1

चौपाई

बहइ न हाथु दहइ रिस छाती। भा कुठारु कुंठित नृपघाती।।
भयउ बाम बिधि फिरेउ सुभाऊ। मोरे हृदयँ कृपा कसि काऊ।।
आजु दया दुखु दुसह सहावा। सुनि सौमित्र बिहसि सिरु नावा।।
बाउ कृपा मूरति अनुकूला। बोलत बचन झरत जनु फूला।।
जौं पै कृपाँ जरिहिं मुनि गाता। क्रोध भएँ तनु राख बिधाता।।
देखु जनक हठि बालक एहू। कीन्ह चहत जड़ जमपुर गेहू।।
बेगि करहु किन आँखिन्ह ओटा। देखत छोट खोट नृप ढोटा।।
बिहसे लखनु कहा मन माहीं। मूदें आँखि कतहुँ कोउ नाहीं।।

281.2

दोहा/सोरठा

परसुरामु तब राम प्रति बोले उर अति क्रोधु।
संभु सरासनु तोरि सठ करसि हमार प्रबोधु ॥280॥

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