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श्रीरामचरितमानस 268.2

अरुन नयन भृकुटी कुटिल चितवत नृपन्ह सकोप।
मनहुँ मत्त गजगन निरखि सिंघकिसोरहि चोप ॥267॥

पूरा अध्याय