Utshovऐप डाउनलोड करें

श्रीरामचरितमानस 242.2

नारि बिलोकहिं हरषि हियँ निज निज रुचि अनुरूप।
जनु सोहत सिंगार धरि मूरति परम अनूप ॥241॥

पूरा अध्याय